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URI के बाद अब 300 चीनी सैनिकों से अकेले लड़ने वाले उत्तराखंड के राइफल मैन पे फिल्म

निर्देशक अविनाश ध्यानी ने कहा कि फ़िल्म के हीरो, देश के भी हीरो हैं, जो देवभूमि उत्तराखंड के हैं इसलिए इस फ़िल्म का पोस्टर और ट्रेलर यहीं रिलीज़ करने का फ़ैसला किया गया.

1962 के भारत-चीन युद्ध में 72 घंटे तक अकेले चीनियों से लड़ने वाले शहीद महावीर चक्र विजेता राइफल मैन जसवंत सिंह रावत पर जल्द ही फिल्म रिलीज़ होने वाली है।

जसवंत सिंह रावत का जन्म गढ़वाल के पौड़ी जिले के ग्राम बांडयू में हुआ था। वह 19 वर्ष की उम्र में भारतीय सेना का हिस्सा बन गए थे। उनकी भर्ती 19 अगस्त 1960 को हुई थी और उन्होंने 14 सितंबर 1961 को ट्रेनिंग पूरी करने के बाद 1962 के भारत-चीन युद्ध लड़ा। 17 नवंबर 1962 को गढ़वाल राइफल्स की चौथी बटालियन की एक कंपनी को नूरानांग ब्रिज की सुरक्षा के लिए तैनात किया गया था।

धीरे-धीरे समय बीतता गया और सेना के पास जरूरत का सामान ख़त्म होने लगा. इसलिए सेना को आदेश दिया गया कि कमपनी को वह वहां से वापस बुला ले। सभी के हौंसले पस्त होने लगे थे। सेना ने भी कदम वापस लेने शुरु कर दिए, तभी जसवंत सिंह ने आगे बढ़ते हुए तय किया कि वह पीछे नहीं हटेंगे और उन्होंने पीछे हटने के आदेश से बगावत कर दी। जसवंत सिंह के साथ लांस नायक त्रिलोक सिंह नेगी और गोपाल सिंह गुसाईं ने भी रुकने का फैसला किया।

बताया जाता है कि जसवंत सिंह की सहायता सेला और नूरा नामक दो लड़कियों ने की थी। इन लड़कियों ने ही जसवंत को खाना पानी पहुँचाया। तीन दिन बाद नूरा को चीनियों ने पकड़ लिया। इसके बाद उनकी मदद कर रही दूसरी लड़की सेला पर चीनियों ने ग्रेनेड से हमला किया और वह भी शहीद हो गई। बाद में पास के पहाड़ियों का नाम सेला और नूर रख दिया गया।

जसवंत सिंह ने कई जगहों पर इस तरह से बंदूक रखी थी कि चीनी को यह लगा कि उस पोस्ट पर कई सैनिक मौजूद हैं लेकिन तीन दिनों के बाद जब चीनी को यह पता चला कि केवल एक व्यक्ति पोस्ट की रखवाली कर रहा था तो चीनी सैनिक गुस्से में आ गए। नाराज चीनीयो ने पीछे और सामने दोनों तरफ से हमला किया, और इस फायरिंग में जसवंत सिंह पर गोली लगी और वह घायल हो गए। घायल होने के बाद भी वह आखरी सांस तक चीनी सेनिको से लोहा लेते रहे और मातृभूमि की रक्षा में उन्होंने प्राण त्याग दिए। उन्होंने युद्ध में 300 से ज्यादा चीनी सैनिकों को मार डाला।

चीनी इतने गुस्से से गुस्सा थे कि उन्होंने जसवंत सिंह का सर काट डाला और वापस अपने साथ चीन ले गए। युद्धविराम के बाद, जसवंत सिंह की बहादुरी से प्रभावित चीनी सैनिकों ने, जसवंत सिंह का सर पीतल के धड के साथ समान्पूर्वक लौटा दिया।

बताया जाता है की आज भी मरणोपरांत महावीर चक्र पाने वाले जसवंत सिंह अपनी पोस्ट पर देश की सिमा की रखवाली कर रहे हैं। आज के समय में नूरानांग में जसवंत सिंह गढ़ नाम का एक मेमोरियल है, जहां सेना के जवान उनकी वर्दी और खाना लेकर जाते हैं। इतना ही नहीं भारतीय सेना पूरी प्रक्रिया के अनुसार ही उनका प्रमोशन भी करती है।

देखे ट्रेलर


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